खंजर
मेरे विश्वास की जमीं पर
यह समय दर समय
अपना आकार लेता गया
मैं जख्मों से कराहता रहा
तुम इसे सहलाते रहे
इस दरम्यान जिन्दगी
रंग बदलती रही
फिर एक रोज जब
खंजर हुआ पूर्णाकार
तुमने कर दिया उससे
मेरा जिगर चाक
और फिर
सबने साबित किया
खंजर तो मेरे ही थे.
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
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