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Showing posts from 2016

रात के पिछले पहर

वजूद

तुम

...आ जाना

ढ़लती उम्र

चेहरा.

युद्ध

हमारा प्रेम, एक असाध्य वीणा.

रंगोली

आदमी

मिट्टी हूँ मैं

गजल

घेरा

यादें

ख्वाहिश

उलझन

पिता

खंजर

शूल

अपना पता

तुम याद आये

क्रम

उम्मीद

मेरा नाम

दो लफ्ज़ों की बंदिश

तेरे मेरे दरम्यान

लक्ष्य

जीवन

अव्यक्त

आज फिर..

इंतजार

तुम्हारी जय है.