बापू

दरख़्त के शाखों पर जीव
खोह बनता है
उसे नोचता है, खाता है
उसपर बीट करता है
दूर गगन में उड़ता है





फिर भी
थक- हार कर सकून वहीँ पाता है
आश्रय का घोंसला वहीँ बनता है
बापू
तुम दरख़्त हो.
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