कृष्ण
कृष्ण अजन्मा है
क्योंकि
जो जन्म लेगा वह मृत्यु का वरण करेगा
और कृष्ण अजर हैं, अमर हैं
वह हममें है
वह तुममें है
वह कण-कण में है, वह समाधिस्थ है
दरअसल
कृष्ण एक अवस्था है
जिसमें
व्यवस्था का पाप जब चरम पर होता है
तब वह प्रकट होता है।
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
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