तुम्हारे जन्मदिन पर
तुम्हारा होना
प्रेम की एक नई परिभाषा है मेरे लिए
जिसमें ना शब्द हैं
और ना ही कई अर्थ हैं गुम्फित
बस कुछ कोमल अनुभूतियां उभर आते हैं
जैसे पड़ी जमीं पर उग आते हैं हरी दूब
इसकी जड़ें फैलती जाती हैं
फैलती ही जाती हैं
यहां तक कि गहन मौन में भी
हृदय के किसी तल में
इसकी अनुगूंज होती रहती है
यह खत्म ही नहीं होता
जैसे की
अभी भी मेरे होंठों पर मुस्कान है
और मन में जलतरंग सी ध्वनि जब तुम्हें सोच रहा हूं।
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