नया साल
भला कोई ऐसे दस्तक़ देता है
वो भी आधी रात
ठंढक बर्फ जैसी
सर्द रात
जिसमें चांद भी ठिठुरता लगे
और
ओस की बूंदें बन गईं हो जैसे दूध के दांत
लेकिन इसकी दस्तक
ऊन के उन स्वेटरों की तरह है
जिसे प्रियतमा ने अपने प्रिय के लिए अपने गहन प्यार की गरमाहट से बुनी हो
वैसे भी तो
दुनिया को प्रियतमा की हथेलियों की तरह गर्म और मुलायम होना चाहिए
ताकि बचा रहे उर्वर जीवन का अस्तित्व
ताकि बची रहे उम्मीद
नया साल
इन्हीं उम्मीदों के नाम।
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