नव-सृजन
सृजन के लिए
चाहिए होता है
दो सुंदर मन
समर्पण और जतन
जिसके लिए
गुजरना होता है
प्रेम की संकरी गली से
होकर एकसार
जैसे
मिट्टी को
गुजरना होता है
चाक पर चढ़ने से पहले
कई-कई चरणों से
फिर अनगढ़ मिट्टी
होकर एकसार
गढ़ी जाती है
बड़े जतन से
तब जाकर
एक नए जीवन की
एक मीठी आहट होती है
जैसे कि
किसी ने घंटी बजाई हो देवालय में
अनगढ़
उदरस्थ
जो अब ले चुका है
रूप-आकार
कुलांचे भरता
अपनी दुनियां में
जो है निर्द्वंद, निष्पाप
एक दिन
वो आ जाता अपनी दुनियां से
इस दुनियां में
बन सृजन का नवहार।
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