पोशीदा

ख़्वाब को

देखा था एक रोज़

उफ़क पर,

इठलाते इतराते

और जुम्बिश करते हुए


मगर पोशीदा


कुलांचे

जैसे हिरण हो वन में

बारिश हो और भींगे मन में

नक्श उभरे जज़्बातों के


मगर पोशीदा


रंग

खुश-रंग

जैसे इंद्रधनुष हो दामन में

और इधर मोहब्बत

हो जाए निसार

सादगी पे


मगर पोशीदा।

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