मां
मां
एक नाव के जैसी है
रहती सदा मझधार में
कर अपने अरमानों को
अपने ही भीतर दफ़्न
सबके उम्मीदों को
पार लगाती
खुद रह जाती ताउम्र नदी में
और हम
कर महिमामंडित इसे
करते उनसे छल!
क्यों
केवल मां ही बने महान!
पिता भी करके देखे जतन।
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
Comments
Post a Comment