मां


मां 
एक नाव के जैसी है
रहती सदा मझधार में
कर अपने अरमानों को
अपने ही भीतर दफ़्न

सबके उम्मीदों को
पार लगाती
खुद रह जाती ताउम्र नदी में

और हम 
कर महिमामंडित इसे
करते उनसे छल!

क्यों 
केवल मां ही बने महान!
पिता भी करके देखे जतन।



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