ढ़लती उम्र
काश !
ढ़लती उम्र हो जाती कैद
इन्हीं अंकों में
स्थिर,नियत,स्थाई
तेरे-मेरे दरम्यान ;
शब्दों की गुंजाइश न रहती
पलकों में अपनी बातें होती
पर ये काश, काश ! है
उम्र की बढ़ती रेखा भी क्या है
जीवन रेखा का व्युत्क्रम ही तो.
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ढ़लती उम्र हो जाती कैद
इन्हीं अंकों में
स्थिर,नियत,स्थाई
तेरे-मेरे दरम्यान ;
शब्दों की गुंजाइश न रहती
पलकों में अपनी बातें होती
पर ये काश, काश ! है
उम्र की बढ़ती रेखा भी क्या है
जीवन रेखा का व्युत्क्रम ही तो.
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