संयोग नहीं प्रयोग
सत्ता
बहुरूपिया है
वह अपनी जरूरतों के तई रूप बदलता है
उसे फर्क नहीं पड़ता कि
पहले कौन था, आज कौन है
और कल कौन होगा!
यह सत्ता का स्थाई भाव है
बस जो अभी है
चूंकि वह सर्वोच्च शिखर पर है
और चातुर्य में हासिल है उसे महारत
इसलिए अतीत को भूलकर
नए शब्दों को गढ़ता है वह अपनी जरूरतों के तई
मसलन
आन्दोलनजीवी; जैसे कि हों परजीवी
वह शब्द का रूप भी बदलता है
एफडीआई; फॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी, आदि
गोयाकि यह 'संयोग नहीं प्रयोग' हो प्रामाणिक।
Comments
Post a Comment