प्रेम
जैसे लक्ष्मण-बूटी
कभी खत्म नहीं होता
हरसिंगार की
नहीं जाती महक
नदी
नहीं छोड़ती उन्मुक्तता
जैसे दूब
उग आता है बार-बार
इनके लिए
नहीं करना होता है यत्न
ऐसे ही प्रेम है सहज
नहीं चाहता प्रयत्न
बस हो जाता है।
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
Comments
Post a Comment