प्रेम

जैसे लक्ष्मण-बूटी
कभी खत्म नहीं होता

हरसिंगार की
नहीं जाती महक

नदी
नहीं छोड़ती उन्मुक्तता

जैसे दूब 
उग आता है बार-बार

इनके लिए 
नहीं करना होता है यत्न

ऐसे ही प्रेम है सहज
नहीं चाहता प्रयत्न
बस हो जाता है।

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