अप्रैल, 18, 2021

अप्रैल, 18
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अव्यक्त 
जैसे अमावस

गहरी काली लंबी रातें

इन रातों में
एक हूक सी उठती है
दिल में
रह-रह कर

विरह मन का
कमजोर पड़े तन का
'अपरा' के आलिंगन का
तुम्हारे चुम्बन का

और पुरानी यादों का

इन दिनों
इन सबको
दूर से निहारता हूं निर्निमेष

है मेरे लिए भी
सबसे बड़ी यातना यह।

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मई, 01
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अव्यक्त 
शब्द पा रहा है अब

अमावस जा रहा है
पूर्णिमा आ रहा है।।

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