स्त्री

मन करता है
आसमां की अनंत ऊंचाइयों में 
इंद्रधनुषी रंग को खोजकर उसमें ही रंग जाऊं मैं

सागर की अतल गहराइयों में खोकर
सीप में मोती बन जाऊं मैं
मन करता है

मन करता है कि पर्वतों की ऊंचाइयों को छूकर
अपने सपनों को भी साथ साकार कर जाऊं
तो कभी मन करता है कि 
नदी की लहरों में खोकर ही खुद को पाऊं मैं

पर ये कितना संभव ही होता है?
कौन कितना बुद्ध ही हो पाता है?

वैसे भी स्त्रियां बुद्ध के मार्ग में वर्जना ही थीं न!

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