तुम्हारे जन्मदिन पर (अपरा)
तुम्हें सोचते हुए
रोज़ एक नई दुनिया बुनता हूं
तुम्हारी हंसी तुम्हारी रूलाई
तुम्हारी ढिठाई
तुम्हारा गाना तुम्हारा खेलना
तुम्हारी कौतूहल भरी उत्सुकता फिर
अगले ही क्षण हैरतों से भर जाना
और तो और
तुम्हारी शैतानियां तक भी
मेरी दुनिया के तंतु हैं
जिससे रोज़ एक नई दुनिया बुनता हूं
और ऐसा नहीं है कि
इसके लिए मुझे उद्यम करना होता है
यह सहज है जैसे
चलती है पवन, ढलती है शाम
निकल आते हैं सूर्य और बहती है गंगा
जैसे रेशम के कीट
रच देते हैं रेशमी तंतु
इसके लिए नहीं करना होता उन्हें उद्यम
सब होता है समुज्ज्वल, नैसर्गिक, सहज
और इन विशेषणों में अभी भी मुझे
बस तुम्हारा ही ख़्याल आ रहा है अपरा।
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