मैं हूँ गाँव का.
मैं हूँ गाँव का, रहता हूँ दर-बदर
गाँव से शहर में शहर से गाँव में
दरअसल, इन दो के बीच
वो विशाल सा बरगद का पेड़
अरहर के खेतों की खुशबू
कावर में नाव की शहंशाही,
मन्टू का एक दिन सर्द में अचानक
चला जाना हमेशा के लिए,
घर के पीछे वाली कटहल पर भूत का भ्रम
यासीन चाचा के यहाँ लेमनचूस की चोरी
वो उम्र में बड़ी
अनजानी सी लड़की की
अनजानी सी लड़की की
तारफल के अन्खुओ सी डबडबाई
झील सी आँखें,
झील सी आँखें,
यादों के सेतु हैं, जिससे होकर
माँ-बापू के पास रोज हो आता हूँ
ले आता हूँ उनका आशीर्वाद।
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फिर शर्त लगती है जिन्दगी से
रोज यूँ ही चलने की उसके साथ
दौड़ता रहता हूँ इस शहर में बेतहाशा-बदहवास
सोचता हूँ बैठकर कभी-कभी
हार गया शर्त उस दिन क्या
यादों के सेतु भी होंगे विलीन अंतस से ...
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