रूढ़ शब्द बिहारी का दर्द :

रूढ़ शब्द बिहारी का दर्द :


ओहो निशि क्यों इनके मुहँ लगती होबिहारी है. एक माँ-बेटी को उस रिक्शेवाला से तय किराए को लेकर हुए बकझक पर एक दुसरे से ये कहते सुना तो मैं धक् से रह गया था. उस रिक्शेवाला की ओर मेरे कदम खुद-ब-खुद बढ़ गए थे. आत्मीय भाव से पुछा थाभैया कहाँ से हो तो उसने बताया बस्ती से हूँ. मतलब बिहार का नही था. फिर समझा 'बिहारीशब्द का इस्तेमाल विशेषण के रूप में असभ्य के लिए किया गया था. हमने आपस में अपने-अपने घर गावं की कुछ बातें की और फिर एक दुसरे को खुदा-हाफिज कहा. ये उन दिनों की बात है जब दिलवालों की दिल्ली आये मुझे चन्द रोज ही हुए थे. जिन्दगी भी न जाने क्या क्या रंग दिखाती है.



गुजश्ते वक़्त के दरम्यान कई घटनाएँ घटित हुई. कुछ बुरे अनुभव भी रहे तो कुछ उम्मीदों से बेहतर भी. कई दोस्त ऐसे मिले जिसने खुलके गले लगाया तो कुछ ने पुर्वाग्रस्त होकर मेरे बिहारी होने से अपने संबंधों को लक्ष्मण रेखा की जद में ही रखा. विविधता में अनेकता की बातें तब सिर्फ किताबी ही लगती थी. हर कदम पर मैंने हर किसी के लिए हर उस संबोधन का पुरजोर विरोध किया जिसमें तनिक भी व्यंग्य की बू आती थी. कहते हैं की आदमी कितना लोकतंत्रिक है इसकी पहचान इससे होती है कि वो अपने से कमजोर को कितना सम्मान देता है. फिर क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसे क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो. प्रसिद्धि मिलने के बाद किसी से सम्मान मिलना उसकी चाटुकारिता ही तो होती है.



खैर, बात कर रहा था बिहारीशब्द के रूढ़ हो जाने की उस मानसिकता पर जिसका मतलब ही असभ्य बेईमान बलात्कारी आदि होना है. हालाँकि ऐसी मानसिकता हर किसी की है ऐसी बात नही है. बिहारी शब्द से पढ़ाकू मेहनती इंटेलीजेंट आदि का चित्र भी जेहन में उभरता है परन्तु आनुपातिक दृष्टि से ये बहुत कम ही हैं.  मेरे खुद के अनुभव भी इसकी पुष्टि करते हैं. पर ऐसी मानसिकता बहुतों की आज भी है. उनकी नज़र में काबुल में गधे नही होते हैं. दरअसल में बुरे व्यक्ति किसी खास विशेष वर्ग या जगहों के ही नहीं होते. एक ही घर में विभिन्न  स्वाभाव के लोग होते हैं. ये तो परिवेश विशेष के उत्पाद मात्र है. इसे समझने की जरुरत है. और इसकी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर से ही मिलेगी. घर ही वह प्रयोगशाला भी है जहाँ से हम अपने उत्पाद की प्रारंभिक पैकिंग करते  हैं. ऐसा नहीं है की जेहन में ये बातें आज यकबयक आ रही है. आज शाम पार्क में टहलते हुए कुछ छोटे बच्चों की  तकरार देखी-सुनी थी जिसमें फिर वही बिहारीशब्द दुहराया जा रहा था एक को नीचा बताने के लिए. अबकी  मै केवल धक् से ही नहीं रह गया बल्कि सीने में कोई चीज़ टूटी भी थी. मेरे पावँ फिर उस बच्चे की ओर मुड़े, मैंने  पहले उससे दोस्ती की, उसके मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की. बातों-बातों में पता चला उसकी माँ उस  बच्चे के यहाँ जिसके संग वो खेल रहा था, काम करती है. फिर कुछ और पूछने की हिम्मत न हुयी. मन भारी हो  गया था. फिर ये सोचते हुए अपने घर की ओर लौट चला कि इतने सभ्य कहलाने वाले कितने सभ्य हैं? क्या  ऐसा ही हमारा देश है जिसपर हम सब गर्व करते हैं?


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