स्याह ही श्वेत है..
अक्सर रात में
नींद खुलती है मेरी
कुछ दूर निकल जाता हूँ
पगडंडियों से होकर,
जहाँ मिलती है महक
उस छोटी लड़की के भुने भुट्टे की
दौड़ पड़ती है जो खाने को लंगर
वो बूढा मिल जाता है जो बांचता है भविष्य
वहीं मिलता है होरी
पूछता है मुझसे
अबकी मिले थे न झुनिया से
क्या अब भी बचा है
सहना का आना लेने उससे सूद!
आ जाता है तभी वहाँ
किसानों का एक समूह
समवेत स्वर से पूछते हैं
चूल्हे उनके घर के अब जलते हैं न रोज
वहीँ दूर खड़ा अख़लाक़ मुस्कुराता है
नहीं आता है वो मेरे पास
अनुत्तरित छोड़ इनको
जाता हूँ उसकी ओर
एकदम से करता है वो मुझसे
एक सवाल -
किये तो थे पवित्र अपने माहौल को
फिर इधर कैसे बंधू?
हुआ निरुत्तर, बढ़ता हूँ आगे
कुछ दूर जाकर पगडण्डी
हो जाती है विलीन
उन मजदूरों के हुजूम में
जो हैं दर-बदर, बेघर, बेबस
लौट आता हूँ फिर वापस
स्याह ही श्वेत है लगता अब
बदली आबोहबा में.
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