स्वाद - बेस्वाद
कोई नई चीज दिख जाए जहीं
चखता था स्वाद वो मैं जरूर
कुछ स्वाद से मन होता आहा
कुछ से मन करता आह ; इस
आह के स्वाद या सच कहूँ तो
उससे, जो नहीं आता मुझे पसंद
तुम्हें करता मना चखने से भी
यह भाव था प्रेम का जो सहज
शबरी के भाव में गुंथा होता।
पर _________________
जब सोचता हूँ मैं तुम होकर तो
ये लगता है कि
जितना नहीं आया था मुझे पसंद
उतने ही स्वाद से रखा है तुम्हें दूर
जिसका अनुभव करना था तुम्हें स्वयं
अतिरेक प्यार में हुआ है मुझसे ये गुनाह
फिर मेरा सारा स्वाद बेस्वाद हो जाता है।
चखता था स्वाद वो मैं जरूर
कुछ स्वाद से मन होता आहा
कुछ से मन करता आह ; इस
आह के स्वाद या सच कहूँ तो
उससे, जो नहीं आता मुझे पसंद
तुम्हें करता मना चखने से भी
यह भाव था प्रेम का जो सहज
शबरी के भाव में गुंथा होता।
पर _________________
जब सोचता हूँ मैं तुम होकर तो
ये लगता है कि
जितना नहीं आया था मुझे पसंद
उतने ही स्वाद से रखा है तुम्हें दूर
जिसका अनुभव करना था तुम्हें स्वयं
अतिरेक प्यार में हुआ है मुझसे ये गुनाह
फिर मेरा सारा स्वाद बेस्वाद हो जाता है।
Comments
Post a Comment