ताज

तुम्हारे ख्व़ाब का आँचल
रात को जब मेरी चादर होती है
अहले सुबह
मैं ताजमहल हो आता हूँ

दीवारों की दिलकश पित्रा-दुरा नक्काशी से तुम
झांकती, मुस्कुराती हो मेरी तरफ
दरवाज़ा-इ रौज़ा की देहरी पर
तुमसे रू-ब-रू गुफ़्तगू करता हूँ




चार बाग़, मेहताब बाग़ से गुजरते
यमुना को निहारते, बेला गोधूली में
एक दूसरे को खुदा हाफिज़ कहते हैं
फिर किसी रोज़ मिलने का वादा लिए हुए

सच ही
एक दरवेश ने मुझे
मेरे ख्व़ाब में कहा था
बेजुबाँ इश्क़ की जुबाँ है ये ताज.
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