दिल्ली में दंगाई

दिल्ली 
उजड़ी है कई बार लेकिन 
जो भी आए
जहां कहीं से आए
अपने और पराए

अंततः 
इससे मोहब्बत कर बैठे
यहीं का होकर रह गए

अबकी फिर
उजड़े हैं दोनों
दिल भी दिल्ली भी

यह तय है
तुम फ़िर से इससे मोहब्बत कर बैठोगे
और यह तुम्हें भी
अपनी बाहों में भर लेगी
क्योंकि 
इसने उसे भी टूट कर चाहा है
पीठ में इसके जिसने खंजर घोंपा है

यही दिल भी है और
दिल्ली भी

लेकिन 
जब भी लौटकर तुम आओगे 
अपने अपराधबोध से क्या
खुद को बचा पाओगे?

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