दो लफ्ज़ों की बंदिश
चाहती हो होना मुक्त
उस अदृश्य बंधन से
जिसमें
दो लफ्जों की बंदिश थी
तुम्हारा यही चाहना
मुझे टूटकर चाहना है
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तुम हुये मुक्त
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और तुम्हें मुक्त करना
तुम्हें टूटकर चाहना है.
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
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