सवाल

जब मैं सवाल करता हूँ 
तो वो तिलमिला जाते हैं
कहते हैं कि
मैं देश के खिलाफ हूँ 
क्योंकि मैं उनकी चुनी हुई सरकार के खिलाफ हूँ

'उनकी चुनी हुई सरकार' इसलिए कि
वे सरकार के खूंटे से ऐसे बंध जाते हैं 
जहां सवाल करना उनसे सवाल करना हो जाता है
और यह किसे पसंद होता है!

वे यह कहते हैं कि 
जो सवाल मैं सरकार से करता हूँ
वही सवाल औरों से क्यों नहीं करता?
चूंकि मैं सवाल औरों से नहीं करता 
इसलिए मैं सरकार से सवाल नहीं कर सकता

दरअसल 
वे सवाल की प्रतिष्ठा नहीं समझते
वे इतना नहीं जानते कि सवाल कर्ता से होता है
जो कर्ता है वही सृष्टा है
वर्तमान और भविष्य का

और अगर ऐसा नहीं है 
तो फिर ऐसी सरकार की अवधारणा ही कैसी?

सवाल तब भी मौजूं है।

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