घर लौटते लोग
कहते हैं कि
देहरी से निकला
एक दिन लौट आता है फिर अपनी देहरी
जैसे कि पूरी दुनियां गोल हो
लेकिन
अपनी देहरी वापस लौट के आना
सबके लिए आसान कब हुआ है!
इस दुनियां के भीतर भी तो दुनियां है
एक पूरी दुनियां
जो गोल नहीं है
है ऊबड़-खाबड़ जैसे यूराल
उलझी इतनी जितनी होती हैं सड़कें
इन्हीं पर चलते-चलते
वह उम्मीद करता है कि
अपनी देहरी को चूमेगा एक दिन
जैसे राजा ने चूमा था
पर वह भूल जाता है कि
वह राजा नहीं है
राजा उसकी बनाई दुनियां में रहता है
और वह राजा की.
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