लक्ष्य

मेरे घर के मुंडेर से 
दिखता है
पुरैनिया डोभा 
जिसके दायीं ओर है 
ताड़ के छह पेड़ क्रमबद्ध

इसपर
बया बुनती है घोसला 
बैशाख की भरी दुपहरी में

आंधिया
उड़ा ले जाती है अक्सर
तिनकों का बन रहा उनका आशियां

वो रुकती नहीं है 
थकती नहीं है
लगी रहती है अपने काम में 
अविचलित अनवरत

एक दिन पूरा होता है लक्ष्य
और वो करती है गृह-प्रवेश 

जैसे
जिंदगी भी तो सपाट नहीं
पर
विभिन्न झंझावातों से होकर 
मुकम्मल करती है अपना पड़ाव.

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