मेरी बेटी

मेरी दो बेटियां हैं
दूसरी हर दिन बड़ी हो रही है
ऐसे कि मुझमें जो भी कमी रही है
उसे वो भर रही है

किसी दिन कुलांचे भरने लगती है
कभी हँसने लगती है
तो किसी दिन रोने भी लगती है
ठीक जैसे हमारे रिश्तों में प्रेम का रूप रहा है

आज तो इतनी बड़ी हो गई है कि
उसने किया है अन्न-ग्रहण 
और इधर मैंने उसकी मां से समझा है अर्थ
क्या है तप-त्याग, स्नेह-मोह और समर्पण

मेरी जो एक और बेटी है 
वह हमेशा रहती है स्मृतियों में
जब वह आई थी 
उसकी नन्हीं उंगलियां मेरे हाथों में समाई थी
जिसकी गर्माहट अभी भी मेरे हथेली में है
जब मैं शब्द लिख रहा हूं.

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