ख्वाहिश

हजारों ख्वाहिशें
थी बिखरी
हवाओं में..
गढ़ रहा था सब
अपना-अपना
रूप-आकार
कुछ में तो
कलियाँ भी फूटी
कुछ थे अब भी
अपने-अपने
शिकवों के तले
दबे हुये..
कुछ थे अपने उत्कर्ष पर



...और फिर बारिश हुयी
मुसलाधार बारिश हुयी.

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