गजल

उन्हें हुनर है खूब इस दुनियादारी का
खंजर भी नही और क़त्ल हो जाता है।

दर्द के सफहों की तहें बना लेता हूँ
कभी तो सलवटें आयेंगी इसमे भी।

तेरे मेरे दरम्यान आ जाता है इश्क़
और सजा की तारीख बढ़ जाती है।

अपनी नज़रों में गुनाहगार हूँ अब
किसी रोज सजा मुक़र्रर होगी मेरी।

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