हमारा प्रेम, एक असाध्य वीणा.

हमने प्रेम किया
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फिर
अपने-अपने तल पर
इसे साध लेना चाहा
प्रेम को
उन्मुक्त छोड़ा ही नही
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प्रेम फिर भी उड़ान भरता
जैसे उड़ते हैं नीले अम्बर में पतंग
पर ठहर जाता
बंधनों में हर बार
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प्रेम ठहराव भी तो नहीं
जितनी कोशिशें की
इसे साधने की
उतना ही असाध्य होता गया
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हमारा प्रेम, एक असाध्य वीणा.

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