आर्टिकल 15

'कहब तो लग जाई धक से।' यह इस फ़िल्म का मुकम्मल वाक्य है और इस फ़िल्म की सार्थकता भी। फ़िल्म यहीं से शुरू होती है और यहीं से ख़त्म भी जो सामजिक संरचना में श्रेष्ठता का दंभ लिए जमात को मानवीय मूल्यों की गरिमा को मौन में समझाने का प्लॉट उपलब्ध कराती है। यह फ़िल्म समाज में व्याप्त जातिगत विद्रूपताओं से जूझते हुए दिखती है लेकिन सीधे-सीधे टकराती नहीं है। फ़िल्म का हीरो व्यवस्था से विद्रोह कर उसे एकदम से पलट देने का हीरोगिरी करते भी नहीं दिखता है। लेकिन यह फ़िल्म घटनाओं को ऐसे पिरोता है कि 'अनकहा' अपनी तीव्रता में 'कहे' जैसा ही मारक लगता है। इस स्तर पर यह फ़िल्म गांधीवाद की राह पकड़ती है जहां सुधार के लिए हृदय परिवर्तन होने को 'टूल्स' माना गया है। यह इस फ़िल्म का अंतिम आयाम है। लेकिन इस अंतिम आयाम से पहले फ़िल्म की राह बाबा साहेब के 'जय भीम' से होते हुए गुजरती है। जातिगत विद्रूपता अपने नंगे रूप में आकर तथाकथित सभ्य समाज के मुखौटे को चीर-फाड़ डालता है। यह इस फ़िल्म का तनाव है। अगर हम इतिहास में जाकर देखते हैं तो यही तनाव हमें गांधी और बाबा साहेब के नजरिए के बीच दिखता है । गांधी ह्रदय परिवर्तन चाहते हैं तो आंबेडकर व्यवस्था-परिवर्तन के हिमायती हैं।
आर्टिकल 15 इन्हीं मुद्दों पर अपना तानाबाना रचते हुए समाज के और समाज के लिए बनाए गए सिस्टम की विद्रूपताओं को उसके नंगे रूप में रखने का साहस करती है। चाहे वह पुलिसिया तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र या फिर जाति के अंदर जाति की कुरूपता। इस बिंदु पर यह फ़िल्म सफल रही है।
हालांकि फ़िल्म में कुछ पात्रों का चरित्र सही से उभारा नहीं गया है जैसे कि चंद्रशेखर रावण और रोहित वेमुला से प्रेरित लगने वाला पात्र निषाद और उसकी प्रेमिका गौरा, जिसे फ़िल्म में व्यापक कैनवास मिलता तो कहानी और गुम्फित हो सकती थी। बाकी फ़िल्म अपने पटकथा , निर्देशन, छायांकन और अभिनय आदि में दुरुस्त है। धूसर रंगों का उपयोग और साउंड में सन्नाटे का इस्तेमाल कहानी को रूहानी टच देने में कामयाब रहा है। अपनी कुछ सीमाओं के वाबजूद यह फ़िल्म याद रखी जाने वाली है।

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