क्या सच है!

1.
मेरे घर अल सुबह अज़ान की आवाज आती है
जिसमें रूह मेरे लिए देव आवाहन का है
ऐसा इसलिए कि
मैंने अपने बचपन से लेकर जवानी तक सूरज की पहली किरण, जो गावँ के चाचा हैं उनके देव आवाहन और 'जयघोष' से ही निकलते देखा है।
2.
उनके इस कभी न टूटने वाले क्रम ने सहज ही कई सारी चीजों का बीजारोपण किया
धीरे-धीरे बीज से पौधे बने
पौधों में लगे विश्व बंधुत्व और भाईचारा जैसे फूल जो मन के धागों में गूँथ गया।
3.
'एक बनेंगे, नेक बनेंगे
मानव मात्र- एक समान
जाति वंश सब- एक समान
नर और नारी- एक समान'
ये ही सारे वो फूल थे जिससे न जाने कब मन का धागा बुन गया और पता ही ना चला।
4.
अब जब समानता की ओट में असमानता का व्यापार हो रहा है
राम और रहीम में फर्क किया जा रहा है
तो याद हो आते हैं गांव के वही मेरे चाचा जिनके देव आवाहन और 'जयघोष', गांव के मस्जिद के 'अजान' में घुलकर एकसार हो जाते थे।
5.
निस्सार सोचता हूँ कभी ऐसे कि
मान लें मेरे गावं में अज़ान देने वाला सुलेमान को अगर किसी गैर मुल्क़ का साबित कर दिया गया
भले ही उसके जिस्म से यहीं की मिट्टी की ख़ुशबू आती हो
यही मिट्टी उसका वतन हो
यहीं वह पैदा हो और दफ़्न होने की भी ख्वाहिश रखता हो
जैसे मुग़ल आए और इसी मिट्टी से मोहब्बत कर बैठे
यहीं का होकर रह गए
तो क्या अब सुलेमान गैर मुल्क़ का हो जाएगा क्योंकि उसका मजहब वो है जिससे हुक्मरान को चिढ़ है!
6.
क्या सच है!
वो अल सुबह अज़ान जिसमें रूह देव आवाहन का लगता था
या वो सच ही नहीं था, बस एक भ्रम था
या बस आस्था रही थी मेरी और कुछ नहीं।

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