सहनशीलता

हितोपदेश के एक श्लोक की एक पंक्ति है 'विद्या ददाति विनयम', यानी कि ज्ञान से विनम्रता आती है। यह विनम्रता हमें फलों से भरे पेड़ की डाली की तरह झुकना सिखाती है। विनम्रता की यही पूर्ण अवस्था सहनशीलता है। लेकिन यह विद्या साधारण सांसारिक न होकर आत्मज्ञान का है।
सरल शब्दों में कहें तो जिसे आत्मज्ञान हो गया वह खुद ब खुद सहनशील हो जाएगा। यह आत्मज्ञान हमें 'वसुधैव कुटुम्बकम' सिखाती है। संकीर्णताओं से हमें दूर करती है। अपना-पराया में विभेद खत्म कर देती है। वहीं सांसारिक विद्या इन सबों का परिग्रहण किए रहती है। जिसने साधारण सांसारिक विद्या को ही अभीष्ट माना है उसमें विनयशीलता के बदले अहंकार आ जाता है। अहंकार और सहनशीलता में हमेशा से वैर रहा है। जहां एक होगा वहां दूसरा रह ही नहीं सकता।
भारत जैसे मुल्क को अंग्रेजों से आजादी दिलाने में और उसे एक संप्रभु देश बनाने के लिए गांधी जी ने जिस साधन का इस्तेमाल किया था वह सत्य और अहिंसा था। सत्य और अहिंसा की राह पर चलना सहनशीलता का सर्वोच्च स्तर है जहां आकर यह कमजोरी नहीं बल्कि ताकत बन जाता है। गांधी जी इस राह पर चल सके क्योंकि उन्हें किसी से वैर नहीं था। उन्हें मानवमात्र से प्रेम था।
एक छोटा सा उदाहरण है। एक व्यक्ति किसी लोहार के द्वार से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़े की चोटों को सुना और भीतर झांककर देखा कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर और विकृत होकर पड़े हुए हैं। उसने सोचा कि समय और उपयोग ने ही उनकी ऐसी गति की होगी। फिर भी उस व्यक्ति ने लुहार से पूछा, 'इतने हथौड़ों को इस दशा तक पहुंचाने के लिए आपको कितने निहाइयों की जरूरत पड़ी?' लोहार हंसने लगा और बोला, 'केवल एक ही मित्र', एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है, क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई चोट सहती है'।
यह सत्य है कि अंत में वही जीतता है, जो सभी चोटों को धैर्य से स्वीकार करता है। निहाई पर पड़ती हथौड़ों की चोटों की भांति ही उसके जीवन में भी चोटों की आवाज तो बहुत सुनी जाती है, लेकिन हथौड़े अंतत: टूट जाते हैं और निहाई अपने मूल गुण को आत्मसात किए सुरक्षित बनी रहती है।
हमें यह सिखाना और समझना होगा कि सहिष्णुता और सहनशीलता कमजोरी नहीं, ताकत है। इस ताकत से खुद को हम अजेय बना सकते हैं।

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