गणतंत्र/जनतंत्र

हुक्मरान जब सत्ता को शाश्वत समझ लेता है
अपने हर फैसले को पत्थर की लकीर और आवाम को रियाया

वह भूल जाता है कि उस वक़्त भी 
प्रतिरोध दर्ज होता रहता है

समय हर एक प्रतिरोध को दर्ज करता है 
भले वह प्रतिरोध आदमकद हुक्मरान को सामने अपने बौना ही दिखे

धीरे-धीरे इन प्रतिरोधों का संगम होता है
एक दिन दरिया, समंदर होता है

जब तख़्त पलट दिए जाते हैं 
तब चूर हुक्मरान का गुमान होता है

और जनता राज संभालती है. 

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