आग

'आग लगाने वाले कौन हैं
उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है'
साहब,
संतोषी को पेट की आग थी
किसान को पेट की आग है
उसकी इतनी हैसियत भी नहीं कि पूरे परिवार का तन ढक सके
इस नाम पर हाँ, इतना होता है कि वो एक फंदा बना ले जिसपर झूल सके
और तो और
सुना है कि सच भी नंगा ही होता है
क्या इसलिए उसके रौंदे जाने और जिस्म के भीतर राख हो रही आग का पता नहीं चलता है!

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