जन-आंदोलन
अगर उठने वाली आवाज़ हुकूमत के खिलाफ़ है तो हुकूमत चाहती है कि उसमें हिंसा हो ताकि उसके हिंसक दमन का उसे ओट मिले जिससे ऐसा लगे कि वह सही है और साथ ही ऐसा भय भी पैदा हो जाए कि विरोध में उठने वाली हर आवाज मसल दी जाएगी।
यह किसी एक हुकूमत की बात नहीं है। यह सार्वकालिक है क्योंकि यही हुकूमत का सार्वकालिक चरित्र है। लेकिन यह भी सार्वकालिक है कि हुकूमत को अहिंसा के आगे झुकना ही होता है।
हिंसा से सफलता गर मिल जानी होती तो कोई बुद्ध नहीं हुआ होता कोई गाँधी नहीं हुआ होता और न ही कोई भगत सिंह।
जरूरी है जन-आंदोलन की तासीर जिंदा रखना। शेर के खाल में जो घुस आते हैं भेड़िये उनसे चौकस रहना। अहिंसा से बड़ी कोई शक्ति नहीं। लेकिन यह साधना चाहती है। अहिंसा में ही शौर्य है, अहिंसा में ही विजय है।
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