प्राकृतिक संरक्षण और पर्यावरण के बेहतरी में शिक्षा
हमनें प्रकृति को मां कहा है। वह मां है, यह सच भी है क्योंकि वह हमारी 'सुप्रीम' पालक है। जैसे हर मां अपने बच्चों की गलतियों को ताउम्र हर संभव सुधारती रहती है वैसे ही प्रकृति हमारी उद्दाम चाहतों से पर्यावरण में उत्पन्न हुए कुव्यवस्था को अपने तई व्यवस्थित करने में अनवरत लगी रहती है। जब हमारी गलतियां दहलीज पार कर जाती है तब यह ठीक एक मां की तरह ही कभी कभी एक दो चपत भी लगा देती है। प्रकृति जब ऐसा करती है तब कभी कोसी विकराल होती है कभी केदारनाथ होता है कभी टाइफून, महा, बुलबुल तो कभी मिट्टी, वायु और मौसम रूठ जाते हैं।
शिक्षा हमें हमारी ऐसी ही गलतियों की पुनावृत्ति करने से रोकती है। वह हमें जरूरत भर उपयोग करना और संचय करना दोनों सिखाती है। इसलिए शिक्षा, प्रकृति एवं पर्यावरण के संरक्षण और इसकी बेहतरी में अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन यहाँ शिक्षा का मतलब सिर्फ अक्षर का ज्ञान भर नहीं है, यह शिक्षा प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना है। जिन्हें ऊंची शिक्षा नहीं मिली है, जिन्हें अक्षर का सही ज्ञान नहीं है उन्होंने भी प्रकृति को खूब समझा है, भरपूर जिया है। आदिवासी; जिनकी पहचान जल, जंगल, जमीन है, प्रकृति के प्रति उनकी संवेदना हमसे कहीं बेहतर है, ऐसा मानने में कोई उज्र नहीं। पद्मश्री सिमोन उरांव का योगदान क्या पर्यावरण संरक्षण में एक 'माइलस्टोन' नहीं है!
लेकिन इसके इतर भी इतनी ही गहरी बातें भी हैं। वैसे तो हम सबों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होना चाहिए ही। चूंकि शिक्षा के एक बड़े भाग का दायित्व शिक्षकों के ऊपर है तो ऐसे में यह शिक्षकों की दोहरी जिम्मेदारी हो जाती है कि वे ऐसे 'टूल्स' विकसित करें जिससे बच्चे पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हों।
जैसा कि विश्व पर्यावरण दिवस पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘लोगों को प्रकृति से जोड़ना’ है और यह कुछ और नहीं बल्कि ‘अपने आप से जुड़ने’ का तरीका है। यह शिक्षा और पर्यावरण का एकाकार होना है। निचोड़ कहें तो ऐसा होना प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण में शिक्षा का अभिष्ट है और ऐसी ही जागृति की क्रांति करना पर्यावरण के लिए शिक्षा का चरम बिंदु भी।
लेकिन इसके लिए शिक्षा की बुनियाद में ही पर्यावरण के प्रति प्यार और आकर्षण के परत डालने होंगे। इसे एक सामूहिक जिम्मेदारी समझना होगा। बच्चों की प्रारंभिक पाठशाला उसका घर होता है। बच्चों के मन के कोरे कागज पर उनके अभिभावक को पर्यावरण से प्यार का एक रंगोली भी बनाना होगा। साथ ही साथ हमें भी अपने हिस्से के कर्तव्य करने होंगे। 'पर उपदेश' से ही काम नहीं चलने वाला है। जैसे कोई बच्चा कितनी भी तेजी कर ले या अपने चेहरे के ऊपर चेहरे लगा ले लेकिन मां अपने मौन में भी सब समझ लेती है, वैसे ही प्रकृति भी सब समझती है आखिर वह भी तो मां है।
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