हिंदी दिवस

हिंदी दिवस मात्र पर अब
रंग-रोगन होता हिंदी का,

सच हुयी कहावत खुद की खुद पर
घर का जोगी जोगड़ा.
होते शिकार खुद अपनी
देखती मूक बेचारी हिंदी,

मुहँ में राम बगल में छुरी
हाय! देखो इसकी मजबूरी.

नहीं मिटा, शेष है अब भी सब
छोड़ दें बस हम अपने ढोंग,

फिर महकेगी आँगन में हिंदी
ग़र मिलकर कदम बढ़ाएं इसकी ओर.

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