ओ३म् (ॐ)

तुम्हारे
कंठ से निकले सरगम
तुम्हारे होंठों से
गोल छल्ला बनाते हुए जब
मुझतक आते हैं
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शांत सौम्य
निर्मल कोमल
गुम्फित
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ऐसा लगता है कि
उस छल्ले में कायनात ने
अपना परिभ्रमण पूरा किया हो.

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