मुखौटा

बाहरी औ' भीतरी स्तर पर
केवल एक ही नहीं हूँ
इन दोनों के बीच
कई चेहरे हैं

चेहरों में कई परतें हैं
जिसे चस्पा लेता हूँ
अपने ऊपर
अपनी जरूरतों के तई
प्रतीक भी तो एक चेहरा है
राम भी औ' रावण भी
मैं चेहरे को मुखौटा नहीं कह रहा
हाँ मैं मुखौटा नहीं कह रहा
यह संभ्रांत नहीं लगता
क्योंकि
यह सारा उद्यम
इसी संभ्रांत दिखने का है
लेकिन हर एक
परतों के नीचे
मिटता रहता हूँ
अपने ही
शून्यता के अंधकार में
यह इस चेहरे के परतों की कीमत है

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