प्रेम
प्रेम
सुर्ख लाल गुलाब पर
ओस की बूँद ही नहीं
प्रेम
केवल तुम्हारा खुदा
या मेरा राम ही नहीं
प्रेम
दो दिलों के धड़कनों की
फ़ांस भी है
जो कभी निकलती नहीं
साँसों में अटकी रहती है.
मेरी भावनाएं आकार ले उससे पहले ही उसके गर्भपात हो जाने कि दास्तान, उल्काश्म है. जिसमें मैं हूँ, यकबयक उत्पन्न हुयी मेरी भावनाएं हैं और आपका साथ है, नहीं तो सबकुछ दिल ही दिल में ख़त्म होकर रह जाती.
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