लिपस्टिक अंडर माय बुरका
हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों से कमतर आँका गया है. उसकी भावनाओं को न्यूनतम आश्रय मिला है. बहुधा दिल की बात दिल में ही दफ़्न हुयी है. उसका अवचेतन उसके अरमानों का ब्लैकहोल है.
'लिपस्टिक अंडर माय बुरका' उसी अवचेतन की डोर पकड़ते हुए बेलौस चलती है और कहीं गुम भी हो जाती है. जो जैसा हुआ वैसा ही बिना किसी मुखौटे के सामने रख दिया गोयाकि यह आज के समय की रूढ़ि तोड़ने की एक पहल 'नेचुरल सेल्फी' #naturalsalfie हो. अब यहाँ आके यह मायने नहीं रखता की यह इस डोर को कहाँ तक लेकर गया है. अपेक्षाकृत कम सुविधाओं के बावजूद भारतीय महिला क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में बस जीतते जीतते रह जाती है, तो भी उसकी जीत ही होती है. यह बस हमारे दोयम व्यवहार की हार है, जैसा की लिपस्टिक अंडर माय बुरका के चारो पात्र हार के भी जीत जाती है और पुरुषवाद जीत के भी उनके आगे नैतिक रूप से वीर्यहीन होते हैं.
चारों पात्र अपने अपने सपने जीने के लिए निकलती है तो कथित मर्दवादी अहम् की बेड़िया उनके पैर में डाली जाती है जहाँ वे खुलकर इसका विरोध नहीं कर पाती हैं, यहां तक की वैवाहिक बलात्कार में भी. और इन सारी बातों का शिकन उनके सिगरेट के धुएं के छल्ले में दिखता है. यह आज के अधिकांश महिलाओं की आपबीती भी है.
यह फिल्म तथाकथित आदर्श स्थिति को न दिखाकर आज के युवजन के खूबी खामी को सीधे सामने रख देता है. हालांकि पहले भी इन आदर्श स्थिति की लकीरों को तोड़ा गया है पर यह फिल्म भी इस दिशा में एक माइलस्टोन है.
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