शिकारी (राजनीतिक)

जैसे बाज झपट्टे से
करता है शिकार
और बनाता है उसे अपना खुराक
वैसे ही हम झपट्टे से
ग्रासते हैं
असमान विचारों की खुराक
इस झपट्टे में कभी-कभी लहू भी होता है
यह लहू हर बार अपना ही होता है
जिसपर सत्ता का गुलाब खिलता है
और
राजनीति अपनी राजनीति पर मुस्काती है
अमूमन अब यह
आम-जन के अदृश्य चेतन पर वार करती है
जिसमें
वस्तुतः हम होते हैं शिकार
लेकिन हम हैं शिकारी, ऐसा भ्रम होता है.

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