रेलवे स्टेशन पर प्रतीक्षारत एक रात

लोगों की चहलकदमी 
खानाबदोश सा

कभी बाएं कभी दाएं
कभी सर्पिल कभी सीधी
जब तक अनाउंस, प्रतीक्षा की होती रही

एक मरियल काला कुत्ता
पूरे स्टेशन इधर से उधर

लपलपाती जीभ लेकिन दिखता चौकस
घूमता रहा

दस घंटे बीस मिनट
लेट की प्रतीक्षा खत्म हुई

लोग यूँ सजग हुये जैसे होते हैं जंगली खरगोश
आधी रात भी तो ले रही थी उन्हें अपने आगोश

धक्कामुक्की का एक छोटा सा दौर चला
डब्बे में, मैं पहले चढ़ा तो मैं पहले चढ़ा
मैं भी इस रेलमपेल में रेल हुआ
ट्रेन आ गयी बंधु, ये क्या कम हुआ.

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